||निर्णय आपको करना है, दासता छोडनी है, बहु बेटियों को सुरक्षित रखना है

||निर्णय आपको करना है, दासता छोडनी है, बहु बेटियों को सुरक्षित रखना है,
या,
इन धर्म गुरुजनों की बात मानकर दुबारा गुलाम होना है ||

इश्वर शिव परम पूज्य परमेश्वर हैं, जिनकी कोइ भी सीमाएं मानव के लिए निर्धारित करना संभव नहीं है,
और....
चुकी समाज मानसिक रूप से पूरी तरह दास हो चूका है, इसलिए वोह कुछ प्रश्न पूछता नहीं , और इश्वर शिव जो की पूर्ण योगी भी हैं, और वैरागी भी, उनके वैराग मैं खोट दिखा दिया जाता है,

यह कह कर की शिव क्रोधित हो कर तीसरी नेत्र खोल देते हैं |क्रोधित होकर उन्होंने कामदेव को तीसरा नेत्र खोल कर भस्म कर दिया|

और हिन्दू समाज की दास मानसिकता देखीये, वोह कभी धर्मगुरुओ से यह भी नहीं पूछते कि एक पूर्ण वैरागी और इश्वर कैसे क्रोधित हो सकते हैं,
तथा
क्या यह संभव नहीं है कि इश्वर शिव ने प्रसन्न होकर तीसरे नेत्र को खोल कर कामदेव को शरीर रूपी बंधन से मुक्त कर दिया हो ?

सबसे पहले तो यह समझ लें कि इश्वर सदेव श्रृष्टि हित, समाज हित और मानव हित मैं सोचते हैं, परन्तु आपकी मानसिकता दासता वाली रहे तभी शोषण संभव है, इसलिए आपको सबकुछ तोड़ मरोड़ कर इश्वर पर आपका विश्वास कम करने की नियत से बताया जाता है|

तभी धर्मगुरु आपकी मानसिकता पर हावी होकर समाज का शोषण बे रोकटोक कर सकते हैं|
और इसमें संस्कृत विद्वान, जो विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में समाज से जो अनुदान मिलता है उस पैसे से पढ़ कर ज्ञान प्राप्त करते हैं, समाज के शोषण के लिए धर्मगुरुओ का साथ देते हैं |

शिव जी की समाधि समाप्त हुई, कामदेव ने समाधि की समाप्ति के पर्व को अपनी रचना से और सुंदर बनाया, उसके लिए शिव जी ने प्रसन्न होकर उनको शरीर रूपी बंधन से मुक्त करा~~इसे पुरूस्कार समझ कर आगे बढ़ेंगे तो निष्कर्ष विज्ञान के अनुकूल होगा, और जैसा कि धर्मगुरु चाह रहेहैं, शिवजी ने क्रोधित होकर दण्डित करा तो समाज का शोषण होता रहेगा;

वैसे सबकुछ गलत बताकर जिन्दा लाश तो बना दिया है समाज को!

अब प्रश्न यह है कि सही क्या है, और क्या गलत; इसका निर्णय कैसे हो ??

कैसे निर्णय हो कि क्या सही है और क्या गलत ?

बहुत आसान , आप और मैं वर्तमान सोच को ही सही मानते हैं, और सूचना यह है कि श्रृष्टि के आरम्भ मैं प्रकृती का फैलाव अभूतपूर्ण था, बड़े बड़े जीव जंतु उत्पन्न हुए ;तथा पुराण भी इन्ही तथ्यों की पुष्टि करती है,

यानि कि कामदेव को शरीर रूपी बंधन से मुक्ति एक सकारात्मक सोच थी|

यह भी समझ लें की आज हमसबको मालूम है कि अब श्रृष्टि और प्रकृति सिमटती जा रही है, सिकुडती जा रही है, और त्रीव गति से,....

तथा कामदेव को शरीर रूपी बंधन की सीमाएं दे दीगयी द्वापर युग के अंत मैं, जो की सूचक है कि अब प्रकृति सिमटेगी |

यानी की पुराण की सूचना वर्तमान सोच से मेल खाती है,

निर्णय आपको करना है, दासता छोडनी है, बहु बेटियों को सुरक्षित रखना है,
या,
इन धर्म गुरुजनों की बात मानकर दुबारा गुलाम होना है |

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